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जल संचयन के कार्य में जस्त चढ़े लोहे के तारों के जाल औरे पोलीथीन के बोरों का नवीन प्रयोग किया गया है। यह तरीका किफायती है और भारतीय परिस्थितियों में उपयोगी भी। प्रस्तुत है पदमपुरा पनढाल में हुए इस प्रयोग का विवरण खुद इसके प्रवर्तक की कलम से।

      आठवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जल-संरक्षण का एक बड़ा कार्यक्रम चलाया गया है। यह हमारे सूखाग्रस्त क्षेत्रों के बहुमुखी विकास को गति प्रदान करेगा।

      पषुपालन, कृषि वानिकी, बागवानी, मत्स्यपालन, रेषम-उत्पादन व प्राथमिक कृङ्ढि प्रसंस्करण आदि विविध गतिविधियों को भी मुदा और जल संरक्षण कार्यक्रम में षामिल कर लिया गया है। एक खास बात और मृदा और जल संरक्षण के लिए मात्र अभियांत्रिक ढांचे की बजाय अव जोर वानस्पतिक उपायों पर है।

मुख्य उद्देषय

      मृदा और जल संरक्षण के वानस्पतिक विधि स्थापित करने के लिए भी कम कीमत के अभियांत्रिक ढांचों की जरूरत पड़ जाती है। इसके पीछे मुख्य विचार यह है कि आरम्भ के कुछ वर्षों में मृदा और जल संरक्षण का काम यांत्रिक ढांचे प्रभावी रूप से करते हैं, तब तक वानस्पतिक साधनों को जड़ जमाने का समय मिल जाता है।

      यही सोच कर इस लेखक और उसके साथियों ने पदमपुरा राष्ट्रीय पनढाल (पदमपुरा नेषनल वाटरषेड), जयपुर में कम कीमत के अभियांत्रिक ढांचों की कल्पना की, उनकी डिजाइन बनाई और निर्माण किया जिनमें जी. आई. (जस्ते चढ़े लोहे के) ताराें के जाल और पौलीबैगों का प्रयोग किया गया।

      ढांचे में सीमेंट के खाली पोलीबैगों को प्रयोग किया गया। ये बैग सबडिवीजनल और डिवीजन कार्यालयों में बहुतायात से मिल जाते हैं और इनका कोइ अन्य महत्वपूर्ण उपयोग भी नहीं है। इस प्रकार यह नई पध्दति परम्परागत पक्के अधिप्लवन मार्ग (ड्रापस्पिल वे) की अपेक्षा मात्र 20 प्रतिषत लागत में तैयार हो जाती है। यदि परम्परागत ढांचे का निर्माण कम-से-कम एक महीने में हो तो अपेक्षाकृत इस ढांचक के निर्माण में दो दिन से अधिक नहीं लगते। इस ढांचे की धारण षक्ति बिना अधिक लागत व समय के बढ़ाई व घटाई जा सकती है।

      इस द्वारा चलाए जा रहे मृदा और जल संरक्षण कार्यक्रम का एक प्रमुख काम नालियों का उपचार करना है। इस उपचार के मुख्य उद्देषय हैं

(1) नालियों का मजबूती प्रदान करना।

(2) मृदा और जल को नाली में रोकना ताकि वहां लगाए गए वानस्पतिक को मजबूती मिले।

(3) पानाी के बहाव को सुरक्षापूर्वक प्रमुख नाली में मोड़ना। नाली में मिट्टी को रोकने वाले ढांचे वानस्पतिक उपायों को जमने में सहायता करते हैं। या उन स्थानों को सुरक्षा प्रदान करते हैं जिनका संरक्षण और किसी तरीक से सम्भव नहीं।

जब पानी का बहाव अधिक नहीं होता और सुस्थापित वानस्पतिक उपायों द्वारा नियन्त्रित किया जा सकता है तो वनस्पति की जड़ें गहरी होने तक अल्पकालिक ढांचे भी नाली में बनाए जाते हैं। स्थायी ढांचों का प्रयोग केवल तब किया जाता है जब कम लागत वाले तरीके अव्यावहारिक होते हैं।

पदमपुरा मामले में पानी का बहाव तेज रहा है तो भी स्थायी ढांचों के बदले कम लागत के उपकरणों को प्रयोग सम्भव हो सका।

डिज़ाईन सम्बन्धी विचार

     सामान : कम लागत की तकनीकों के लिए स्थानीय रूप  से उपलब्ध सामान का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया गया। कार्यस्थल से 35 किलोमीटर दूर अच्छी किस्म के पत्थर उपलब्ध हैं। चूंकि इस क्षेत्र में चींटियों की समस्या है इसलिए लकड़ी के लट्ठों के ढांचे उचित नहीं। इसीलिए इस लेखक ने सीमेंट के खाली प्लास्टिक बैगों (बोरों) के प्रयोग के बारे में सोचा। ये बैग भी आसानी से बहुतायात में उपलब्ध हैं।

     सर्वेक्षण और अन्वे"k : नाली का सर्वेक्षण किया गया। एल सेक्षन और क्रास सेक्षन की डिजाईनें बनाई गईं। नाली के आरंभ से अन्त तक ऐसे एल सेक्षन और क्रास सेक्षन वाले ढांचें अभिकल्पित किए गए जिनमें खर्च कम-से-कम आए और पानी ज्यादा-से-ज्यादा जमा हो।

     कार्यप्रणाली : ढीली मिट्टी और जैव पदार्थ को हटाने के लिए 15 से 20 सें.मी. तक जमीन खोदी गई। इस पर जी.आई. नैट (जस्ते चढे लोहे के तार से बने जाल) को इस प्रकार फैलाया गया ताकि पोली बैगों का समस्त ढांचा इसमें लपेटा जा सके। रेत से भरे और प्लास्टिक के धागे से सिले बैगों को इस प्रकार रखा गया जैसे सूखी चिनाई की दीवाल मेर्ं ईंटें रखी जाती हैं। डिजाइन के अनुसार इन बोरों को रखने का कार्य पूरा होते ही इनको जी.आई तार के जाल में लपेट दिया जाता है ताकि यह एक इकाई बन जाए।

      ढांचे के सामने का हिस्सा (ऐप्रन) सूखे गोल पत्थरों का बनाया जाता है। इन पत्थरों को भी जी. आई. तारों के जाल में लपेट देते हैं। इसकी नींव के लिए 10 से 20 सें.मी. जमीन खोदी जाती है। जी. आई. नैट को उस नींव पर फैला दिया जाता है। 20 से 30 सैं.मी. आकार के पत्थरों की सूखी चिनाई को जालमें लपेट दिया जाता है। नीचे के जाल के जोड़ को छोड़ कर एक ऊपर के जाल के जोड़ों से बाँध दिए जाते हैं। इस काम में भी जी.आई. तार प्रयुक्त किया जाता है। ऐसा पत्थरों को अपनी जगह जमने रहने के लिए किया जाता है। एप्रन के जाल को ड्राप के जाल से भी बाँध दिया जाता है। एक बारिष के बाद ढाँचे पर पानी के ऊपरी बहाव की ओर जब मिट्टी और पानी इक्ट्ठे हो जाएं तो वानस्पतिक अवरोधक लगा दिए जाते हैं।

     विवेचन : ढाँचा जून के अन्तिम सप्ताह में बनाया गया था। इसके बाद वङ्र्ढा की दो ऋतएँ आईं। ढाँचा ज्यों-का-त्यों रहा। ऊपरी हिस्से में गाद भर गई और पानी इक्ट्ठा हुआ। एक बारिष के तुरन्त बाद ढाँचा और इसका कार्य निष्पादन चित्र संख्या 1 2 में दर्षाया गया है।

      ऊपरी बहाव वाले हिस्से में पानी और गाद जमा हो जाने से ढाँचे के ऊपर व नीचे व दोनों और लगाए गए वानस्पतिक अवरोध अच्छी तरह से जक गए।

      दूसरी वर्षा ऋतु में 25 जुलाई, 1992 को सांगानेर में तीन घन्टों में 180 मि.मी. बारिष हुई जो पनढाल से 20 कि.मी. दूर है। इस तेज बारिष ने सांगानेर के तमाम जलाषयों को तोड़ दिया और इसके कारण आई बाढ़ ने सांगानेर से लेकर पनढाल तक नीचे के लगभग समस्त जलाषयों और ढाँचों को तोड़ दिया लेकिन जी.आई. नैट और पोलीबैग से बने ढाँचे बचे रहे। पनढाल में भी तीन में से एक ढाँचा, बाढ़ के पानी में बह गया। ऐसा मिट्टी की अत्यधिक क्षरणीयता के कारण हुआ।

     लाभ : इस प्रकार के ढाँचे अपेक्षाकृत कम ऊंचाई तक साधारणतया लगभग एक मीटर तक, काफी प्रभावी होते हैं। ये निम्नलिखित उद्देषयों के लिए भी प्रभावी तौर से प्रयुक्त किए जा सकते हैं।

Ø      प्रमुख जल निकासी प्रणाली में 'ग्रेड की स्थिरता' कायम करने के लिए।

Ø      मृदा क्षरण नियन्त्रण के लिए।

Ø      मिट्टी और पानी का बहाव रोकने के लिए।

Ø      वानस्पतिक उपचार को सहायता देने के लिए।

Ø      तेजीसे गाद जमा करने के लिए, जहां भी ऐसा जरूरी हो।

इस नवीन पध्दति के अनेक लाभ हैं :-

Ø      इस पध्दति में स्थायित्व अधिक है।

Ø      परम्परागत ढाँचों की अपेक्षा इसकी लागत कम आती है।

Ø      परम्परागत पक्के 'ड्रीपस्टिल वे' के चार या छ: सप्ताह के मुकाबले इसके निर्माण में एक या दो दिन लगते हैं।

Ø      पूर्व प्रयोग किए हुए सीमेंट के पोली बैगों का अच्छा उपयोग हा जाता है।

Ø      ढाँचे की धारणषक्ति बिना अधिक पैसा और समय खर्च किए बढ़ाई जा सकती है।

तुल्नातमक लागत : यह परम्परागत ढाँचों की तुलना में कम लागत का तरीका है। इसकी लागत लगभग आठ हजार रूपए आती है। जो परम्परागत ढाँचे की पाँचवाँ भाग है।

सीमा : यदि यह ढाँचा बिना वानस्पतिक अवरोध के बनाया जाता है तो यह अल्पजीवी होता है। अत: यह ढाँचा बरसात से पहले बना लेना चाहिए। ढाँचे के ऊपरी प्रवाह तथा निचले प्रवाह की ओर तथा नाली के दोनों ओर वानस्पतिक अवरोध बारिष के दौरान बाद लगा देने चाहिए। यह वनस्पति ऐसी हो जो जल्दी बढे अौर इसे पशु आदि न खाएं।

 

बुन्देलखण्ड के पठारों में मृदा एवं नमी संरक्षण

     भारत एक कृिप्रधान देष है जिसका प्रमुख व्यवसाय है कृिएवं पशुपालन। कृङ्ढि पर निर्भर जनसंख्या की आर्थिक स्थिति कुछ अच्छी नहीं है जिसका प्रमुख कारण है खेती की अपनुपयुक्तता। इसका अर्थ है - 60 से 80 प्रतिषत कृियोग्य भूमि पर सिंचाई  के साधनों की कमी, खेती योग्य भूमि का ढालू होना, समुचित खाद एवं उन्नत किस्म के बीजों का समय पर उपलब्ध न होना, "kर् ा की अनियमितता आदि। सामान्यत: सूखी अवस्थाओं में तथा विशे"kत: सीमान्त बारानी क्षेत्रों में प्राय: कम, अस्थिर और लाभहीन उत्पादन होता है। इस प्रकार की भूमि की उत्पादन क्षमता की किसी-न-किसी तरह से ह्रास होता है। जनसंख्या वृध्दि के कारण ऐसे भूमि को उपयोग में लाना बहुत आवष्यक हो गया है। पेड़ों की निरन्तर कटाई से वानस्पतिक परत में कमी हो रही है जिससें भूमि का कटाव होता है जिसके कारण पर्यावरण का संतुलन भी बिगड़ रहा है।


 

 

      बुन्देलखण्ड में झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, बांदा तथा जालौन जिले आते ह। इनका कुल क्षेत्रफल है लगभग 29.6 लाख हैक्टेयर परन्तु केवल 18.9 लाख हैक्टेयर क्षेत्र पर ही खेती की जाती है। जबकि बुन्देलखण्ड में कुल 1.73 लाख हैक्टेयर क्षेत्र पर उद्यान लगे हुए हैं। जल संसाधनों की कमी, कम एवं असामयिक वर्षा, मिट्टी का उपयुक्त न होना, अत्यधिक ढालू एवं पथरीला होने से यह क्षेत्र बहुत पिछड़ा हुआ है।

      बुन्देलखण्ड में मुख्यत: दो प्रकार की मिट्टी पाई जाती है।

1-                काली मिट्टी :

काली मिट्टी में दो प्रकुख वर्ग की मिट्टी पाई जाती है - काबर और मार। इस तरह की मिट्टी में जल धारण क्षमता बहुत अधिक है और उत्पादन क्षमता भी अत्यधिक है।

2-               लाल मिट्टी :

इस मिट्टी को राकर और परबा दो समूह में विभक्त किया जा सकता है। इस मिट्टी में जल धारण क्षमता एवं उत्पादन क्षमता बहुत कम है। इस मिट्टी की वृहद संरचना के कारण इसमें भू-कटाव बहुत अधिक होता है।

इसलिए कम ढाल पर भी भूमि एवंज ल का संरक्षण आवष्यक है।

षुष्क क्षेत्रों में पथरीली, बंजर तथा पठारों आदि पर फलदार वृक्ष जैसे नींबू, बेर, आंवला, अमरूद, अनार आदि आसानी से उगाए जा सकते हैं क्योंकि इनकी जल मांग भी अधिक नहीं होती। इस तरह की परती भूमि को उपयोग में लाने के लिए उद्यानीकरण आवष्यक है। ढालू भूमि पर मृदा एवंज जल संरक्षण की उपयुक्त विधियाँ अपनाकर ऐसी भूमि का समुचित उपयोग ही नहीं होगा बल्कि फलों की समुचित पैदावार करके बुन्देलखण्ड क्षेत्र फलों को पैदा करने में आत्मनिर्भर भी बनेगा। बागों में मृदा व जल संरक्षण को मुख्यत: दो भागों में बांटा जा सकता है।

यांत्रिक विधि द्वारा मृदा व जल संरक्षण

      ऊवड़-खाबड़ एवं पथरीली भूमि का यथासंभव समतलीकरण करना आवष्यक होता है क्योंकि वर्षा जल अपने साथ पर्याप्त मात्रामें मिट्टी आदि को बहा ले जाता है। ढाल की प्रतिषत की अपेक्षा जल दो गुणी गति से बहता है जिससे ऊपरी सतह को बहा ले जाने के साथ-साथ खेतों में बड़े-बड़े खड्डे आदि बन जाते हैं। कभी-कभी तो यह इनता विकराल रूप धारण कर लेता है कि बागों के पेड़ पौधे आदि गिर जाते हैं। हालांकि बुन्देलखण्ड क्षेत्र में पथरीली जमीन होने से समतलीकरण समान रूप  से नहीं हो पाता।

मेड़बन्दी करना

      समतलीकरण के पश्चात् यह बहुत ही आवष्यक है कि खेत के चारों ओर मजबूत मेंड़ बना दाी जाए ताकि भूक्षरण रोका जा सके। मेड़ों के परिणामस्वरूप वर्षा जल भूमिके अन्दर अधिक से अधिक मात्रा में चला जाता है और इस नमी का प्रयोग पौधे की गर्मी में आसानी से कर सकते हैं। मेड़बन्दी से न केवल वर्षा जल को रोकने में सफलता मिलती है बल्कि बुल्देलखण्ड में प्रचलित छुट्टा जानवरों की प्रथा का समाधान भी इस विधि द्वारा काफी हद तक किया जा सकता है। मेड़ों के ऊपर बाड़ कांटेदार पौधों, फसलों व पेड़ों को उगा कर उन्हें छुट्टा जानवरों से बचाया जा सकता है।

विभिन्न तरह की ढाल पर समतलीकरण एवं मेंड़बन्दी पर लागत व्यय

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ढाल प्रतिषत  पुरानी विधि         नई तकनीक        बचत/लाभ

           द्वारा लागत         द्वारा लागत         (रू. प्रति हेक्ट.)

           (रू. प्रति हेक्ट.)           (रू. प्रति हेक्ट.)

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1.           4319              3504             815

2.          5124              4809             815

3.          5887              5072             815

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      पहाड़ों के निचले छोर पर विभिन्न नालियों को बनाना अत्यन्त आवष्यक है जिससे कि वर्षा का एकत्रित जल बिना कटाव किए वाटरषैड के निचले भाग में पहँच सके। साथ ही साथ ढाल की विपरीत दिषा में बहाव होने से वरर््षा जल अधिक देर तक नाली में रहता है और जमीन पर्याप्त मात्रा में उसे सोख लेती है। इससे सूखे एवंज ल के नष्ट होने, दोनों समस्याओं का समाधान आसानी से हो सकता है।

कन्टूर पर स्टेगर्ड टे्रन्चेज बनाना/खोदना

      जो स्थान बहुत अधिक ढलान वाले हैं और उन्हे समतल करना भी आसान नहीं है, वहां कंटूर पर स्टेगर्ड तरीके से गङ्ढे खोदने चाहिए। इन गङ्ढों के निचले हिस्से में फलदार वृक्षों का रोपण करना चाहिए। इस विधि से निम्नलिखित लाभ होते हैं -

1)    अधिक ढाल वाली पहाड़ी छोटे-छोटे हिस्सों में बंट जाती है तथा स्टेगर्ड टे्रन्चेज लघु संचयन पाँड का काम करती हैं।

2)    खोदी हुई मिट्टी गङ्ढे के निचले हिस्से पर रखने से उसमें काफी समय तक नमी बनी रहती है जो पौधों को मिलती है।

3)    स्टेगर्ड टे्रन्चेज खुद जाने से बरसात का पानी तीव्रगति से बहने की बजाय मंदगति से बहता है जिससे मृदा का कटाव रूक जाता है और जल का संरक्षण होता है।

4)    इस प्रकार की सॉयल वर्किंग विधि से पौधे लगानेसे उनकी तीव्र वृध्दि होती है जो कि ढालू पहाड़ियों पर वानस्पतिक रोक (वेजिटेटिव बैरियर) का काम करती हैं तथा मृदा के कटाव को स्थाई रूप से रोकती है।

      बुन्देलखण्ड में कम वर्षा तथा उसकी अनियमितता को देखते हुए वर्षा जल को तालाब अथवा गङ्ढों में इक्ट्ठा करने की प्रक्रिया को जल एकत्रीकरण कहते हैं। एकत्रित हुएजल का प्रयोग सूखे के समय अथवा रबी के मौसम में किया जा सकता है। एक जलाषय में 6 हे.मी. जल इकट्ठा करके लगभग 10-15 हैक्टेयर भूमि में कम से कम दो सिंचाईंयां की जा सकती हैं। जल के बहाव पर नियन्त्रण करने के लिए नालियों में छोटे-2 बांध जैसे बना देने चाहिए। निचले स्थानों में जल इकट्ठा करने की विधि को 'सबमरजेंस बंधीज' कहते हैं। इस पध्दति द्वारा भूमि एवं जल संरक्षण के साथ-2 जल इकट्ठा करके तथा उसका उचित समय में उपयोग करके कृषि उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। इस विधि से फसलों में बरसात में इकट्ठे किए हुए जल के उपयोग से होने वाली उपज के अन्तर को नीचे तालिका मे दर्षाया गया है।

फसलों की उपज पर ब"kर् ा जल के एकत्रीकरण एवं उसे उपयोग का प्रभाव


 

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फसल             उपज (कु./हैक्ट.)

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           असिंचित                 सिंचित

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ज्वार        14.7              17.0

मक्का       22.7              30.4

अरहर       3.9               6.3

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स्त्रोत : प्रोसीडिंग समर इंस्टिटयूट देहरादून, 1991 पृष्ठ 29

 

बानस्पतिक रोक (वेजिटेटिव बैरियर)

      वानस्पतिक रोक द्वारा मृदा में वर्षा जल को रोकना एक आधुनिक विधि है। इसके अन्तर्गत मेंड़ों के बगल व ऊपर घास लगाने से बहाव को कम किया जा सकता है। इससे भूमि की ऊपरी परत बहने से बच जाती है। मेड़ों पर लगी घास को काटकर पशुओं को खिलाया जा सकता है। इससे चारे के साथ-2 मृदा एवं जल संरक्षण भी होता है। प्रयोगों के आधार पर यह तय हुआ है कि घासों की वानस्पतिक रोक मृदा एवं जल संरक्षण के लिए उपयुक्त पाई गई है।

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                     कुल जल     जल बहाव    ऊपज

                     बहाव        का रोक            (टन/हैक्ट.)

                     (मि.मी.)           (प्रतिषत)

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1-                 यांत्रिक विधि           58.6        46.1        ---

2-                सुबबूल          67.8        37.6        2.2

3-                वीपिंग लब घास  79.1        27.2        0.62

4-                खस घास        63.6        41.5        0.84

5-                बिना नियन्त्रण         108.7       100.0       ---

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षस्य क्रियाओं द्वारा मृदा एवं जल संरक्षण

मिश्रित खेती

      इस पध्दति में फलदार पौधों के साथ उपयुक्त फसलों को लगाने से न केवल भूमि का समुचित उपयोग होगा बल्कि भूमि कटाव भी कम होगा। क्योंकि षुरूआत के तीन चार वर्षाें तक पेड़ों की वृध्दि की दर भी कम रहती है जिससे फसलों के ऊपर कोई बुरा प्रभाव भी नहीं पड़ेगा। इस पध्दति में कम समय में तैयार होने वाली फसलों एवं घासों को उगाया जा सकता है। जैसा कि तालिका में दर्षाया गया है परती रहने से11.7 टन प्रति हैक्टेयर मृदा बह जाती है एवं 200.7 मि.मी. जल हानि होती है। कुल वर्षा की हानि का प्रतिषत भी परती पड़ी भूमि में अधिक है। घास उगााने से यह सभी हानियां कम होती है।

भूमि की विभिन्न फसल पध्दति में भूमि एवं जल का नुकसान

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फसल पध्दति       मृदा हानि                जल हानि                कुल वङ्र्ढा की

                (टन/हैक्ट.)        (मि.मी.)                 (प्रतिषत)

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घास (डाइकेन्थ्यिम         0.11              12.26             1.5

एनुलेटम)   

उर्द-कुसुम                6.43              150.45                  19.0

सोयाबीन कुसुम           7.94              215.90                  23.2

लोबिया-कुसुम       2.39              76.70             10.4

ज्वार-अरहर        3.62              220.45                  16.6 

परती              11.68             220.69                  27.1

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स्त्रोत : प्रोसीडिंग समर इंस्टिटयूट देहरादून, 1991 पृष्ठ 180

 

सह फसल पध्दति

     

      इस पध्दति के अन्तर्गत फलदार पेड़ों को फसलों के साथ उगाने से न केवल भूमि एवं जल संरक्षण होगा बल्कि खाली पड़ी भूमि का भी सदुपयोग होगा। बुन्देलखण्ड में जहां सिंचाई संसाधनों की कमी है वहां सूखा सहन करने वाली फसलों को, कम समय में पकने वाली चारे की फसलों को सह फसल पध्दति से फल, चारा, ईंधन एवं ऊन प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही षुरू से कुछ सालों तक भूमि का उपयोग करके किसानों की आमदनी को भी बढ़ाया जा सकता है।

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फलदार पेड़ पौधे                 फसल

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1                                                                    2

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बेर/आंवला/अमरूद        खरीफ में ज्वार, मक्का, चरी, लोबिया की सह फसल।

                       

बेर/आंवला/अमरूद        रबी में चना, मसूर, जई, सरसों आदि।

 

नींबू प्रजाति               घासें, दलहनी घासें, ज्वार, लोबिया, चरी, उर्द, मूंग, जौ आदि।

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जलधारक रसायन

      कुछ जलधारक रसायनों जैसे जलषक्ति, एग्रोलाइट-400, ग्रोसोक आदि का प्रयोग खेती में करने से भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ जाती है जिससे पौधों को उनकी अवष्यकतानुसार जल मिलता रहता है। इन रसायनों को रिफिल मिक्चर में मिलाकर फलदार वृक्षों के रोपण के समय गङ्ढों में डालने से उनमें पौधों के लिए काफी समय तक जल संरक्षित रहता है। इस प्रकार के जल धारक रसायनों के प्रयोग से निम्न लाभ होते हैं -

1-                 भूमि की जलधारण क्षमता में सुधार होता है तथा पौधों को लम्बे समय तक जल उपलब्ध रहता है।

2-                इन रसायनों के प्रयोग से जल पूर्ति क्षमता में भी सुधार होता है।

3-                मृदा की भौतिक एवं रासायनिक क्षमता में भी सुधार होता है।

4-                इनका प्रयोग 'सीड पलटिंग' में भी हो सकता है।

 

 

पट्टीदार खेती

      इस विधि में ढलान के विपरीत पतली-पतली पट्टी बना ली जाती है और सबसे ऊपर वाली पट्टी में दलहनी फसलें जैसे लोबिया, मोठ, कुल्थी, सेम तथा घासें (कटाव नियन्त्रक फसलें) लगाई जाती हैं। दूसरी पट्टी में लाईन में बोई जानें वाली फसलें जैसे मक्का, ज्वार, बाजरा और अरहर आदि (कटाव उकसान वाली फसलें) लगानी चाहिए। एक के बाद एक दोनों तरह की फसलों को लगाने से निम्नलिखित लाभ होते हैं -

1-                 वङ्र्ढा जल के साथ बहन वाली मिट्टी कटाव नियन्त्रक फसलों वाली पट्टी में रूक जाती है।

2-                इस प्रकार बरसात का जल अपेक्षाकृत धीमी गति से छन-छन कर निचली जगहों में बिना कटाव किए जाता है।

3-                भूमि को जल सोखने की अधिक समय मिलता है जिससे फसलों के लिए आवष्यक जल भूमि में संरक्षित हो जाता है।ं

4-                खेतों के कोनो पर घासों व फलदार पौधों की बफर स्ट्रिप लगान से भूमि का कटाव रूक जाता है।

घासबाड़ी (ले कॉ्रपिंग)

घासों तथा फलीदार फसलों को दानेवाली फसलों के साथ क्रमबध्द रूप से लम्बे समय तक एक ही खेत में उगाने को घासबाड़ी कहते हैं। इसका मुख्य उद्देष्य चारे के साथ-साथ अन्न प्राप्त करना है। जिसमेंअन्न चारा समस्या का समाधान एकही पध्दति द्वारा किया जा सकता है। इसमें घासों तथा दलहनी घासों का मिश्रण भूमि को पूर्णत: आच्छादितकिए रहता है। इससे वर्षा की बूंदों का सीधा प्रभाव भूमि पर नहीं पड़ता और भूमि को कटाव से बचाया जा सकता है। घासों की जड़ें मृदा कणों को मजबूती से बांधे रखती हैं जिससे कटाव कम होता है और साथ ही इन जड़ों में भूमि में जीवांष भी प्राप्त होते हैं।

वीथी षस्योत्पादन (ऐ ले कॉ्रपिंग)

      वीथी षस्योत्पादन से भोजन, ईंधन, खाद, चारा आदि की पूर्ति होती है क्योंकि इस पध्दति में वृक्षों अथवा झाड़ियों को बाद में बनाई गई वीथियों में लगाया जाता है। षुष्क/बारानी क्षेत्रों में कृङ्ढि उत्पादन में स्थिरता एवं आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए ''पेड़ों के साथ फसल'' कृङ्ढि पध्दति अत्युत्तम रहती है। इस पध्दति में पौधों की कटाई/छंटाई करके हरे चारे के रूप में पषुओं का खिलाते हैं जिससे फसलों की वृध्दि पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता तथा भूमि में उपस्थित पोषक तत्वों, नमी, रोषनी आदि से भी कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती। पेड़ों व झाड़ियों की पत्तियों सहित छोटी-छोटी टहनियों को अवरोध पर्त के रूप में प्रयोग करने से फसलों के लिए मृदा नमी संरक्षित होती है।

1-                 सुबबूल + ज्वार/बाजरा/उर्द/मूंग/अरहर/घासें एवं दलहनी घासें।

2-                युकेलिप्टस + ज्वार/लोबिया/अरहर/घासें/जौं/जई/चना।

3-                बहुवर्ङ्ढीय अरहर + मुंगफली/सोयाबीन/ज्चार/बाजरा/सरसों/जौ/चना/मसूर/अलसी।

 

ढाल के अनुसार भूमि उपयोग

      कुछ महत्वपूर्ण वैज्ञानिक विधियों द्वारा ढलान वाली भूमियों का सही मूल्यांकन करके एवं उपयुक्त विधियों द्वारा जल एकत्रीकरण से भूमि के अन्दा नमी के स्तर को बदला जा सकता है। भूमि की निचली सतह में जल उपस्थिति एवं पोङ्ढक तत्वों को भूमि में संरक्षित किया जा सकता है। ढलवां पहाड़ी युक्त क्षेत्रों में आसानी से प्रयोग में लाए जाने वाले कुछ सुझाव इस तरह हैं।

ऊपरी सतह (चोटी पर)

      इस सतह पर मृदा एवं जल संरक्षण (पत्थरों की मेड़, गङ्ढे खोदना) जल बहाव की दिषा में परिवर्तन (ढाल के विपरीत दिषा में बांध/नालियां) विभिन्न कृषि क्रियाएं, समान ढाल पर गड्डे खोदना, थाला बनाना/ पेडों को लगाना, यांत्रिक विधि से मृदा संरक्षण, वानस्पतिक विधि द्वारा मृदा संरक्षण तथा घास एवं फलीदार पौधों एवं पेड़ों का एक साथ रोपण आदि किया जा सकता है।

मध्यवर्ती सतह

      इस सतह पर मुख्य रूप से मृदा में नमी का संरक्षण, विभिन्न कर्षण क्रियांएं, भूमि पर वानस्पतिक पर्त लगााना जलधारक रसायनों का उपयोग, उपयुक्त प्रजातियों का चुनाव, दाल वाली फसलें, तेल वाली फसलें, सब्जियां, अन्न चारा र्इंधन पध्दति, कृषि वानिकी, वीथा षस्योत्पादन, घासबाड़ी एवं चारा वाली फसलों का फसल पध्दति में समावेष आदि।

निचली परत

      निचली सतह में मुख्यत: चरागाह का विकसित करना, संसाधनों का समुचित उपयोग, चरागाह एवं उनकी चराई, बांधों एवंज ल संसाधनों के किनारों को सुदृढ़ करना आदि कार्य किए जाते हैं।