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फसल उपज (कु./हैक्ट.)
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असिंचित सिंचित
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ज्वार 14.7 17.0
मक्का 22.7 30.4
अरहर 3.9 6.3
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स्त्रोत : प्रोसीडिंग समर इंस्टिटयूट देहरादून, 1991 पृष्ठ 29
बानस्पतिक रोक (वेजिटेटिव बैरियर)
वानस्पतिक रोक द्वारा मृदा में वर्षा जल को रोकना एक आधुनिक विधि है। इसके अन्तर्गत मेंड़ों के बगल व ऊपर घास लगाने से बहाव को कम किया जा सकता है। इससे भूमि की ऊपरी परत बहने से बच जाती है। मेड़ों पर लगी घास को काटकर पशुओं को खिलाया जा सकता है। इससे चारे के साथ-2 मृदा एवं जल संरक्षण भी होता है। प्रयोगों के आधार पर यह तय हुआ है कि घासों की वानस्पतिक रोक मृदा एवं जल संरक्षण के लिए उपयुक्त पाई गई है।
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कुल जल जल बहाव ऊपज
बहाव का रोक (टन/हैक्ट.)
(मि.मी.) (प्रतिषत)
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1- यांत्रिक विधि 58.6 46.1 ---
2- सुबबूल 67.8 37.6 2.2
3- वीपिंग लब घास 79.1 27.2 0.62
4- खस घास 63.6 41.5 0.84
5- बिना नियन्त्रण 108.7 100.0 ---
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षस्य क्रियाओं द्वारा मृदा एवं जल संरक्षण
मिश्रित खेती
इस पध्दति में फलदार पौधों के साथ उपयुक्त फसलों को लगाने से न केवल भूमि का समुचित उपयोग होगा बल्कि भूमि कटाव भी कम होगा। क्योंकि षुरूआत के तीन चार वर्षाें तक पेड़ों की वृध्दि की दर भी कम रहती है जिससे फसलों के ऊपर कोई बुरा प्रभाव भी नहीं पड़ेगा। इस पध्दति में कम समय में तैयार होने वाली फसलों एवं घासों को उगाया जा सकता है। जैसा कि तालिका में दर्षाया गया है परती रहने से11.7 टन प्रति हैक्टेयर मृदा बह जाती है एवं 200.7 मि.मी. जल हानि होती है। कुल वर्षा की हानि का प्रतिषत भी परती पड़ी भूमि में अधिक है। घास उगााने से यह सभी हानियां कम होती है।
भूमि की विभिन्न फसल पध्दति में भूमि एवं जल का नुकसान
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फसल पध्दति मृदा हानि जल हानि कुल वङ्र्ढा की
(टन/हैक्ट.) (मि.मी.) (प्रतिषत)
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घास (डाइकेन्थ्यिम 0.11 12.26 1.5
एनुलेटम)
उर्द-कुसुम 6.43 150.45 19.0
सोयाबीन कुसुम 7.94 215.90 23.2
लोबिया-कुसुम 2.39 76.70 10.4
ज्वार-अरहर 3.62 220.45 16.6
परती 11.68 220.69 27.1
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स्त्रोत : प्रोसीडिंग समर इंस्टिटयूट देहरादून, 1991 पृष्ठ 180
सह फसल पध्दति
इस पध्दति के अन्तर्गत फलदार पेड़ों को फसलों के साथ उगाने से न केवल भूमि एवं जल संरक्षण होगा बल्कि खाली पड़ी भूमि का भी सदुपयोग होगा। बुन्देलखण्ड में जहां सिंचाई संसाधनों की कमी है वहां सूखा सहन करने वाली फसलों को, कम समय में पकने वाली चारे की फसलों को सह फसल पध्दति से फल, चारा, ईंधन एवं ऊन प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही षुरू से कुछ सालों तक भूमि का उपयोग करके किसानों की आमदनी को भी बढ़ाया जा सकता है।
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फलदार पेड़ पौधे फसल
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1 2
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बेर/आंवला/अमरूद खरीफ में ज्वार, मक्का, चरी, लोबिया की सह फसल।
बेर/आंवला/अमरूद रबी में चना, मसूर, जई, सरसों आदि।
नींबू प्रजाति घासें, दलहनी घासें, ज्वार, लोबिया, चरी, उर्द, मूंग, जौ आदि।
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जलधारक रसायन
कुछ जलधारक रसायनों जैसे जलषक्ति, एग्रोलाइट-400, ग्रोसोक आदि का प्रयोग खेती में करने से भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ जाती है जिससे पौधों को उनकी अवष्यकतानुसार जल मिलता रहता है। इन रसायनों को रिफिल मिक्चर में मिलाकर फलदार वृक्षों के रोपण के समय गङ्ढों में डालने से उनमें पौधों के लिए काफी समय तक जल संरक्षित रहता है। इस प्रकार के जल धारक रसायनों के प्रयोग से निम्न लाभ होते हैं -
1- भूमि की जलधारण क्षमता में सुधार होता है तथा पौधों को लम्बे समय तक जल उपलब्ध रहता है।
2- इन रसायनों के प्रयोग से जल पूर्ति क्षमता में भी सुधार होता है।
3- मृदा की भौतिक एवं रासायनिक क्षमता में भी सुधार होता है।
4- इनका प्रयोग 'सीड पलटिंग' में भी हो सकता है।
पट्टीदार खेती
इस विधि में ढलान के विपरीत पतली-पतली पट्टी बना ली जाती है और सबसे ऊपर वाली पट्टी में दलहनी फसलें जैसे लोबिया, मोठ, कुल्थी, सेम तथा घासें (कटाव नियन्त्रक फसलें) लगाई जाती हैं। दूसरी पट्टी में लाईन में बोई जानें वाली फसलें जैसे मक्का, ज्वार, बाजरा और अरहर आदि (कटाव उकसान वाली फसलें) लगानी चाहिए। एक के बाद एक दोनों तरह की फसलों को लगाने से निम्नलिखित लाभ होते हैं -
1- वङ्र्ढा जल के साथ बहन वाली मिट्टी कटाव नियन्त्रक फसलों वाली पट्टी में रूक जाती है।
2- इस प्रकार बरसात का जल अपेक्षाकृत धीमी गति से छन-छन कर निचली जगहों में बिना कटाव किए जाता है।
3- भूमि को जल सोखने की अधिक समय मिलता है जिससे फसलों के लिए आवष्यक जल भूमि में संरक्षित हो जाता है।ं
4- खेतों के कोनो पर घासों व फलदार पौधों की बफर स्ट्रिप लगान से भूमि का कटाव रूक जाता है।
घासबाड़ी (ले कॉ्रपिंग)
घासों तथा फलीदार फसलों को दानेवाली फसलों के साथ क्रमबध्द रूप से लम्बे समय तक एक ही खेत में उगाने को घासबाड़ी कहते हैं। इसका मुख्य उद्देष्य चारे के साथ-साथ अन्न प्राप्त करना है। जिसमेंअन्न चारा समस्या का समाधान एकही पध्दति द्वारा किया जा सकता है। इसमें घासों तथा दलहनी घासों का मिश्रण भूमि को पूर्णत: आच्छादितकिए रहता है। इससे वर्षा की बूंदों का सीधा प्रभाव भूमि पर नहीं पड़ता और भूमि को कटाव से बचाया जा सकता है। घासों की जड़ें मृदा कणों को मजबूती से बांधे रखती हैं जिससे कटाव कम होता है और साथ ही इन जड़ों में भूमि में जीवांष भी प्राप्त होते हैं।
वीथी षस्योत्पादन (ऐ ले कॉ्रपिंग)
वीथी षस्योत्पादन से भोजन, ईंधन, खाद, चारा आदि की पूर्ति होती है क्योंकि इस पध्दति में वृक्षों अथवा झाड़ियों को बाद में बनाई गई वीथियों में लगाया जाता है। षुष्क/बारानी क्षेत्रों में कृङ्ढि उत्पादन में स्थिरता एवं आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए ''पेड़ों के साथ फसल'' कृङ्ढि पध्दति अत्युत्तम रहती है। इस पध्दति में पौधों की कटाई/छंटाई करके हरे चारे के रूप में पषुओं का खिलाते हैं जिससे फसलों की वृध्दि पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता तथा भूमि में उपस्थित पोषक तत्वों, नमी, रोषनी आदि से भी कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती। पेड़ों व झाड़ियों की पत्तियों सहित छोटी-छोटी टहनियों को अवरोध पर्त के रूप में प्रयोग करने से फसलों के लिए मृदा नमी संरक्षित होती है।
1- सुबबूल + ज्वार/बाजरा/उर्द/मूंग/अरहर/घासें एवं दलहनी घासें।
2- युकेलिप्टस + ज्वार/लोबिया/अरहर/घासें/जौं/जई/चना।
3- बहुवर्ङ्ढीय अरहर + मुंगफली/सोयाबीन/ज्चार/बाजरा/सरसों/जौ/चना/मसूर/अलसी।
ढाल के अनुसार भूमि उपयोग
कुछ महत्वपूर्ण वैज्ञानिक विधियों द्वारा ढलान वाली भूमियों का सही मूल्यांकन करके एवं उपयुक्त विधियों द्वारा जल एकत्रीकरण से भूमि के अन्दा नमी के स्तर को बदला जा सकता है। भूमि की निचली सतह में जल उपस्थिति एवं पोङ्ढक तत्वों को भूमि में संरक्षित किया जा सकता है। ढलवां पहाड़ी युक्त क्षेत्रों में आसानी से प्रयोग में लाए जाने वाले कुछ सुझाव इस तरह हैं।
ऊपरी सतह (चोटी पर)
इस सतह पर मृदा एवं जल संरक्षण (पत्थरों की मेड़, गङ्ढे खोदना) जल बहाव की दिषा में परिवर्तन (ढाल के विपरीत दिषा में बांध/नालियां) विभिन्न कृषि क्रियाएं, समान ढाल पर गड्डे खोदना, थाला बनाना/ पेडों को लगाना, यांत्रिक विधि से मृदा संरक्षण, वानस्पतिक विधि द्वारा मृदा संरक्षण तथा घास एवं फलीदार पौधों एवं पेड़ों का एक साथ रोपण आदि किया जा सकता है।
मध्यवर्ती सतह
इस सतह पर मुख्य रूप से मृदा में नमी का संरक्षण, विभिन्न कर्षण क्रियांएं, भूमि पर वानस्पतिक पर्त लगााना जलधारक रसायनों का उपयोग, उपयुक्त प्रजातियों का चुनाव, दाल वाली फसलें, तेल वाली फसलें, सब्जियां, अन्न चारा र्इंधन पध्दति, कृषि वानिकी, वीथा षस्योत्पादन, घासबाड़ी एवं चारा वाली फसलों का फसल पध्दति में समावेष आदि।
निचली परत
निचली सतह में मुख्यत: चरागाह का विकसित करना, संसाधनों का समुचित उपयोग, चरागाह एवं उनकी चराई, बांधों एवंज ल संसाधनों के किनारों को सुदृढ़ करना आदि कार्य किए जाते हैं।